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Kshitij Upadhyay KISHOR | MY XITIZ POETRY | Page 22 of 33

Author: Kshitij Upadhyay KISHOR

हम आशिक है उनके, उनके एक इशारे पे , मर मिटने को तैयार बैठे हैं |

उनके एक इशारे पे , मर मिटने को तैयार बैठे हैं | उनके एक इशारे पे , मर मिटने को तैयार बैठे हैं | हम आशिक है उनके , उनके…

“बचपन अब कहाँ ” , “बचपन अब कहाँ ” तलाश ता रहता हूँ इंटरनेट पर, बचपन को हर रात, इतनी जल्दी क्यों बड़े हो गए?

“बचपन अब कहाँ “ “बचपन अब कहाँ “ तलाश ता रहता हूँ इंटरनेट पर बचपन को हर रात इतनी जल्दी क्यों बड़े हो गए? पर बचपन में तो जवानी थी…

मां तो मां ही होती है , जब गुज़ उठी किलकारी, घर के आंगन में सब हसे लेकिन मैं रो रहा था।

जब गुज़ उठी किलकारी जब गुज़ उठी किलकारी, घर के आंगन में सब हसे लेकिन मैं रो रहा था, क्योंकि मैं उस समय मा से लिपटकर उसकी हुई दर्द महसूस…

जिंदगी; , जहां हर बच्चा कागज की कश्ती का दीवाना था सच कहूं तो वह बड़ा ही खूबसूरत जमाना था …।

जिंदगी 1. जब दादी की कहानियां ही लोरी थी और दादी का गोद ही सिरहाना था सच कहूं तो वो बड़ा ही खूबसूरत जमाना था स्कूल जाने की ख़्वाहिश तो…