The reCAPTCHA verification period has expired. Please reload the page.
सारदौत्यव (वसन्त पंचमी) के अवसर पर विनम्र अर्चना | MY XITIZ POETRY

सारदौत्यव (वसन्त पंचमी) के अवसर पर विनम्र अर्चना

डा० जी० भक्त

हे शारदा ! हे सरस्वती !! हे भगवती, भारती नमस्तुते।
तेरी महिमा है अपार हे विद्यादायिनी पुस्तक हस्ते ।।
जग को ज्ञान दान से पूरित, तू धरती विज्ञान विधात्री।
हंस सवारी, कमलासन हे ! श्वेत तुषार की मालाधारि ।।
निर्मल उज्जवल वस्त्र सुशोभित शिशिर वसंत ऋतु के पोषक।
उपवन तरुवर सरसिज पुष्पित किश्लय मंजर आम्र तरु के ।।
आज उषा की किरण उष्णा फिर दिवा बढ़ा हर्षित हुयी डाली।
ठीक वसंत की सुखद ज्योत्ष्णा धरती पर छाई खुशियाली ।।
शुभ प्रभात नूतन उल्लास, सजावट मंडप का जो रौनक ।
यत्र तत्र सर्वत स्तोत्र की गुंज से जन-जन में है हलचल ।।
दिव्य दिवस सौन्दर्य सुमन सौरभ का वैभव विखर रहे।
बाल युवा बालिका वृद्ध, शुक सारिका के स्वर निखर पड़े।।
नीला सागर नील गगन और हरित धरा की हरियाली।
देव दक्ष सुर मुनि गंधर्व, सुमनवृष्टि कर अमर लेकर लोक से आकर
पृथ्वी पर पुलक छिड़क ज्ञानामृत, जनमन को है सरसाते।
ये सारे जो वृत्त दृश्य समय सापेक्ष होते अतीत के ।।
हे शारदे ! पूजते हम सब क्यों, न पाते हम शील गुण वैसे।
क्या अर्चना करूँ मैं, तुनसे हमें भक्ति दो ज्ञान चरित्र के ।।
नीति धर्म संस्कर सदाचार और प्रीतिनिष्ठा से
सुना पढ़ा न देखा जग में कैसे पाउँ दर्शन तेरा
श्रद्धा सुमन भजन पूजन और सेवा का न भख करु क्या ?
अगली वार तू हे माँ सरस्वती तेरे दर्शन को हे माता ।।
हृदय मंडप मे लेकर श्रद्धा शीष झुकाउँ० सदा सर्वदा।
हो शिक्षा की अधिष्ठात्री तू माता मुझको नही भुलाना।