(सुलभ संदेश)

सुनो जी भैया भारत है यह
डा० जी० भक्त
हम पूरब पश्चिम नहीं जानते,
विजयी विश्व हमारा है।
जहाँ हिमालय हिम गिरि शोभित,
तीन ओर से सागर है।।1।।
गंगा यमुना ब्रह्मपुत्र की,
धारा धरती को सींचे।
जहाँ चाँद सूरज की किरणें,
नील गगन के नीचे ।।2।।
वन वैभव से पूर्ण,
स्वर्ण मोती हिरक फूलों से झूमें ।।3।।
गाती गंगा, चमके चंदा,
हरियाली को कौन कहे।
राम कृष्णा की भूमि,
मंदिर मस्जिद से जो भरे पड़े ।।4।।
गौयें देती दूध, फलों से,
पूरित उपवन ।
कितने आते है शैलानी,
करने दर्शन और पर्यटन ।।5।।
भारत की भव्यता विराट,
कोई भूल न पाता।।
धर्म और आध्यात्म,
ज्ञान-विज्ञान का दाता ।। 6।।
सदा सुहाता, कहलाता,
यह स्वर्ग विश्व में।
भरे विविधताओं से,
प्राकृत दृश्य अनोखे ।।7।।
कहते-कहते थक जाते,
है शेष सरस्वती।
नारद सारद और,
यहाँ के सूर तुलसी ।।৪।।
जहाँ पवित्र गंगाजल,
ज्ञान के वेद विधातृ ।
रामायण, गीता, प्रसिद्ध,
तीर्थ गंगोत्री ।।9।।
जहाँ की धरती धर्म धरा,
कहलाई जग में।
दुनियाँ वालों इसे न भूलों,
हम भारत के ।।10।।
सोचता दिन रात भारत,
भव्य भूषित।
ज्ञान की गरिमा बढ़े फिर,
प्रेम पुष्पित और गुंजित ।।11।।
सत्य अहिंसा शान्ति,
और कल्याण जगत का।
मन कर्म और वचन एक-सा,
सदा सुखी निर्भय हो दिल का ।।12।।
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर द्वितीय कविता