हम लड़ते नही लड़ाते है, डरते नही डराते हैं।

डा० जी० भक्त

जब से है धरती गगन नदी सागर और वनस्पति ।
तब से बादल मौनसून के हरित खेत से तृप्त प्रकृति ।।
झुकी वाटिका आम लीचि से तपती देह और सूखी नदियाँ।
कृषक सब्जियों से प्रसन्न किन्तु सूखी रब्बी की बालिया।।
तप्त धरा मे सूखा चेहरा जल का स्तर नीचा।
कर को मीजते दुखी कृषक जो दुख से खेत नही सींचता ।।
सदा विकास की होड़ लगी आकाश चूमती महँगाई।
सागर मे है तेल उफनता दखिये विश्व में तज लड़ाई ।।
आपात, उत्पाद विपदा देश द्वंद्ध को झेल रहा है।
धरती से अम्बर तक देखो जल है या जल रहा जलद है।।
अन्न अछत महंगाई, उर्जा रहते अंधकार है।
शान्ति के हम दूत दीखते युद्ध से मुक्ति मिल न रही है।।
हम सब धनी कहाने वाले दीन-दुखी और मतवाले।
जो रुस अमेरिका इजराइल या है इरान मानने वाले। ?।
मारेंगे या मर जायेंगे, मरकर हम जीने वाले।
मेरा दम चाहे टूट जाये दुश्मन को न छोड़ने वाले।।
यह गृह युद्ध नही, राज द्रोह नही, धन मोह पर जीने वाले।
विश्व युद्ध से डरते सब है परमाण पर पलने वाले ।।
नही राम यहाँ नही कृष्णा यहाँ जो जल्दी जंग मिटाये।
गाँधी नही न बुद्ध यहाँ मोदी जी आखिर जाये कहाँ।।
नाम कमाना हो ता लड़ना झुकना तो सचमुच मरना है।
जब हम चन्द्रलोक पर बसे, तो फिर क्या डरना है।।
जब प्रदूषण से नही डरे तो ब्रह्मोष से सदा लड़ना है।