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होली आयी रे ! | MY XITIZ POETRY

होली आयी रे !

डा० जी० भक्त

होली आई रे होली आयी।
हर घर में बजी बधाई ।।
यह है बसंत का मौसम।
हर खेतों में हरियाली।।
लगती है कितनी सुन्दर।
रब्बी की फसल निराले ।।
चलकर देखी खेतों में।
सर्वत्र गेहूँ की बाली।।1।।

जिसे देख किसान आनंदित।
विस्तृत सरसो लहराता ।।
है झुकी बालियों उसकी।
जन-जन का मन मुस्काता।।
हर घर नर नारी बालक।
संस्कृति के गौरव पालक ।।2।।

प्रकृति के पावन मनभावन।
प्रफुल्लित है वातायन।।
जहाँ हर्ष और उल्लास भरा।
जन जीवन पाया जन-मन।।
होली वैसा ही उत्सव है।
जो देता जन को मनरंजन ।।3।।

है आज होलिका दहन देखना।
प्रचलन सदा से है लाग।।
संस्कृति का गौख दिखलाता।
है पावन पूनम का फागुन ।।
देखो बच्चों के हाथों में। पिचकारी,
होली का धना।।4।।

चन्दा संदेश दे चला गया।
सूरज ने आकर जगा दिया।।
प्राणों में होली का हलचल।
उमंग खुशी का फैलाया।। 5।।

रंगीन, उषा की लाली में।
सतरंगी आभा लिए प्रभात।।
आज बलेगी धूम-धुम घुम।
रंगों की शीतल बरसात ।।6।।

खाना पीना धम मचाना।
मिलना जलना याद दिलाना।।
भारत के अतीत का गौरव।
गा-गाकर मन को बहलाना।। 7।।

भाव नही खुशियों का हलचल।
आदिकाल का है इतिहास।।
जिसकी गरिमा नहीं भुलाता।
नहीं भुलेगा है विश्वास।। 8 ।।

बाल वृद्ध नहीं, उँच न नीचा।
जाति कुजाति न भाई भतीजा ।।
छोट अद्यम नही, भेद अपूजा।
नर-नारी सम एक, न दूजा।
एक भाव आदर एक प्जा।
प्रस्फुट प्रेम जहें बसे विधाता ।।9।।

भारत की मर्यादा उत्सव।
धर्म कर्म आध्यात्म है उत्सव ।।
शिक्षा उत्सव गरिमा है उत्सव ।
जन जीवन का लक्ष्य है उत्सव।।
खेल-मेल गुणगान है उत्सव।
प्रम और सद्भाव है उत्सव।। 10।।

हे भारतवासी, हर जाति।
मानवता के पोषक पालक ।।
सुखमय जीवन के संवेदक।
और शान्ति के पर्व ही प्ररक ।। 11।।

नहीं भूलना है भारत को ।
जन मन में हर दीप जलायें।।
अपनी गरिमा हेतु पव को।
याद करे और मन बहलायें।।12।।