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गणतंत्रोत्सव वसंतोत्सव राष्ट्रीय-सह-धार्मिक | MY XITIZ POETRY

गणतंत्रोत्सव वसंतोत्सव राष्ट्रीय-सह-धार्मिक

-: महोत्सव :-

26 जनवरी, माघ वसन्त पंचमी

डा० जी० भक्त

गणतन्त्रदिवस
झण्डोत्सव और वसतोत्सव,
लेकिन हमसब विवश
मनाएँ कैसे उत्सव ?
हे भारत माते, विद्यात, विद्यादातृ ।
जन गण के उत्थान और कल्याण कतृ ।
मेरी पूजा जप तप दान और ध्यान नहीं है ।
श्रम सेवा कल्याण स्वास्थ्य निदान यही है ।।
जब मिहनत का मूल्य नहीं मिलता दीनो को ।
राहत का खद्यान्न का अंश देना है हमको ।।
आजादी विकास व्यवस्था सबकुछ पाकर ।
हुए सभी संतुष्ट आज वैक्सिन लगवाकर ।।
ये गुलाम परतंत्र आज स्वतंत्र उसे गणतंत्र बनाया ।
पचहत्तर वषों स तरा आराधना करता आया ।।
नहीं पाये हम कुछ भी देश को दिया बहुत कुछ।
लेकिन कुछ ही लोग है जो पाये है सबकुछ ।।
इतना बड़ा विकास आपका कहाँ छिपा है?
जबकि भारत की राहत पर ही जिन्दा है ।
जब देश विकास कर पाया तो स्वावलम्बी होता ।।
और नही तो जन वितरण गोदाम पर खड़ा न लाइन लगता ।
कैसे मैं नैवेद्य पुष्प फल तुमै चढ़ाऊँ ।।
हे माते, बतला दो किस दल में मै जाऊँ ।

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