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साड़ी बीच नारी है, की नारी बीच साड़ी | MY XITIZ POETRY

                         साड़ी बीच नारी है, की नारी बीच साड़ी

क्षितिज उपाध्याय “किशोर”

साड़ी बीच नारी है, की नारी बीच साड़ी,
साड़ी ही की नारी है, नारी ही की साड़ी,
पाँच गज की साड़ी है, इसलिए पुरूष पर भारी है,
नारी ही तो भारी है, पुरूष भी अनारी है,
साड़ी बीच पुरूष भी जिंदगी बिताने के अभारी है।

साड़ी बीच नारी है, की नारी बीच साड़ी,
साड़ी ही की नारी है, नारी ही की साड़ी,
एक सुंदर नारी है, पुरूष पर भारी है,
सुंदर हो कर के भी पुरुष की जिंदगी बिगारी है,
नारी बीच साड़ी है, नारी ही देश को बिगारी है।

साड़ी बीच नारी है, की नारी बीच साड़ी,
साड़ी ही की नारी है, नारी ही की साड़ी,
नारी ही तो फैशन के आभारी है,
आज एक बिटा कपड़े पर भी आ रही है,
इसलिए पुरूष घरों में जिंदगी बिताने की आभारी है।

साड़ी बीच नारी है, की नारी बीच साड़ी,
साड़ी ही की नारी है, नारी ही की साड़ी,
नारी है, तो उसके ड्रेसिंग टेबल लाख की समान रखा रही है,
पुरूष के एक साल की कमाई भी कम हो जा रही है,
यदि घर से बाहर नरी है, नारी ही तो देश को बिगारी है।

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