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होली आयी | MY XITIZ POETRY

होली आयी

डा० जी० भक्त

निकल पड़ी है बोली, बच्चों मैं यही ठिठोली।
अरे, कैसी रही वह होली, कही गोली तो नही चली ।।
वैसी कुछ भी नही, लेकिन कुछ तो सही।
वह थी गत वर्ष की होली, शोर थी गली-गली ।।
धूल कीचड़ और स्थायी की विविध फुहार चली।
देखो, कल हमने शपथ ली, यह है विकास की घड़ी।।
हिल मिल कर खेले होली, है हम बच्चो की टोली।
साफ सुथरी कितनी, है सजी धजी गाँव की गली ।।
जहाँ से न फैले प्रदूषण वैसी हम सब ने शपथ है ली।
रहना हमें स्वच्छ, स्वस्थ, सुरक्षित और सु-सज्जोत ।।
गंदगी से हो दूर, खान पान शुद्ध और हो पौष्टिक ।
साफ सुथरा और हो सुधरा, व्यवहार पूर्ण ध्यान से रहना।।
बोल चाल संयत हो संगीत गीत गान से सजना।
ऋतु बसंत में बासंती परिवेश वेष सुन्दर घरे ।।
वाद्य सुरीला, सुध्वनित, सौभ्य रसी ला सुना करे।
होली का उत्सव उल्लास का वातायन दीख भी पड़े ।।
मघपान, अभद्र गान, द्वेष घृणा का कहीं न लेश।
सदभाव नित्य की भाँति निखरे प्रेम का सम्वल पाये देश।।
सभ्यता सुरभ्यता सौजन्यता का नितदिन दृश्य दिखे।
धर्म के धाम-सा हर पर्व की शोभा नित्य निखरे ।।
जन जन मे हो हर्ष सदा उत्कर्ष पूर्ण समाज का गौरव।
होली की पहचान बने सदभाव प्रेम का सौरभ ।।