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क्या जनतंत्र क्या गणतंत्र, हम है स्वतंत्र | MY XITIZ POETRY

क्या जनतंत्र क्या गणतंत्र, हम है स्वतंत्र

डा० जी० भक्त

जनतंत्र या गणतंत्र, परतंत्र नही हम है,
सदा स्वतंत्र है मानव, मन के जानते मर्म है
सुख-दुख में एक साथ काटते है हम जीवन,
मानव-मानव एक, हमारा धर्म एक है।
जाति भाषा धर्म, कर्म जीवन के साधक बनते,
इन्हीं मार्ग पर चलकर जन जीवन से लड़ते
रहते एक साथ पढ़ते लिखते और गाते,
एक ही धरती पर जन्में जीते और मरते।
परम धर्म जीवन का विश्व प्रेम कहलाता,
एक ही नल का पानी पीकर मन बहलाता।
नही बिहार बंगाल हिमाचल मेरा दुश्मन,
जंगल खेत पहाड़ और नदियाँ मेरे तनमन।
क्षण-क्षण कुशल क्षेक हम लेते न हम लड़ते,
एक पवन के श्वांस से जीते और है मरते।
एक खून एक मून एक स्न मन को भरते,
कहाँ एक दूसरे से भिन्न मार्ग अपनाते ?
फिर कैसा संघर्ष देश यह मेरा तेरा,
नही खुदा भगवान जहान का है यह खेला।
खाओं गेहूँ धान पियों गंगा का पानी,
देखों धरती के अन्दर क्या भिन्न है पानी।
आओ हम सब मिलकर गाये गीत देश का,
सोचों हम गणतंत्र मनाने चले है किसका।
भूलों भेद भाव आज और कल एक है,
एक भूमि पर वसकर क्यों परदेश कहते है।