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स्वतंत्र भारत का 78 वाँ वर्ष गांठ (2025) | MY XITIZ POETRY

स्वतंत्र भारत का 78 वाँ वर्ष गांठ (2025)

डा० जी० भक्त

हम देश के हैं, नागरिक हम देश सेवक भक्त हैं।
हमें देश के उपर गर्व है, सर्वस्व मेरा उत्सर्ग है।।
इस देश की धरती नदी वन वृक्ष सागर गगन जो।
दिनकर सुधाकर जलद भूधर जीव जलचर पवन जो ।।
दिन रात नित्य पुनीत निर्भर देव सरिता सिंचती है।
पवन पंखा झल सदा बादल बरस नहला रहा है।।
हम रहे ऋणी सदा आसन, वसन, भोजन जो पाते।
अन्न फल जल औषधी भूगर्भ सम्पदा भी है लेते।।
कृतज्ञ हैं हम भारती भारत भरत के नित्य दिन।
पूजत माला चढ़ाते प्राण पन से प्रणत हिल मिल ।।
जन-गण-मन-धन जीवन अर्पित है दातृ है भारत माता।
एकता शान्ति प्रगति समृद्धि हेतु हे भाग्य विधाता ।।
यहाँ सुरक्षा न्याय नम्रता शिक्षा स्वास्थ्य और समरसता।
अनीति अन्याय और आतंक द्रोह से दूर हे माता।।
जग मे अनर्थ के बादल, न वज्ज्र वाण से घिर पाये।
इस धरती पर पाप ताप परिताप से हम मुक्ति पाय।।
राष्ट्र व्यापी स‌द्भाव उदय हो, प्रेम प्रतिज्ञा हो स्थायी।
जन जीवन में खुशी निखरकर श्रद्धापूर्ण विश्वस्त भलाई ।।
राज काज में गति और जनतंत्र बने मजबूत और स्थिर।
सदा सुधार की हवा बहे, प्रदूषण घटे, बढ़े न फिर।।
राम लला और जानकी माता, राम राज्य की प्रथा चलायें।
रावण देशी या परदेशी, एक साथ सब मिलकर गायें।।
हिन्दूदधि से विन्ध्याचल तक हाथ मिलाता रहे हिमालय।
कभी न हो परतंत्र देश भारत माता की जय हो जय ।।