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गणतंत्र दिवस, सत्सव के साथ चुनौती भी | MY XITIZ POETRY

गणतंत्र दिवस, सत्सव के साथ चुनौती भी

डा० जी० भक्त

सदा मनाते है पर्वोत्सव, गणतंत्र को करते याद।
रही संस्कृति सदा देश की इसमें कोई नहीं विवाद ।।
लेकिन हम मानव कहलाते कुछ तो करना हमे ख्याल।
एक मुहूर्त पर पर्व मनाना, गर्व लुटाना बुरा सवाल ।।
देश प्रेम सत्ता में आस्था जन आकांक्षा पर हो ध्यान।
ढ़ोंग, विकास जनता का शोषण भ्रष्टाचार की हो पहचान।।
आन शान सम्मान ज्ञान बलिदान अमूल्य है सदा महत्त्व।
कमियों का अस्तित्त्व मिटाना समृद्धि सद्भाव सुरक्षा ।।
गणतंत्र का गीत पुनीत जो दर्शाता हो सत्य अहिंसा।
छः दोषो को त्याग, धर्म के दश लक्षण के पोषक सत्ता।
अग्रत सकलं शास्त्रं पृष्ठत सशरः धनुः ।।
भारत का सम्मान यही, जय गान यही, वरादान यही है।
यही चुनौती गण तंत्र को भारत माता भी देती है।।
बुरा न माने आदि काल से कालिख इसको लगती।
लाखो बीर कटे धरती पर और गुलामी जड़ जमागी ।।
कह कहते है, देश भक्ति जो जनतंत्र को दे मजबूती।
तब होगी सच्ची श्रद्धांजलि जो स्थापित करे विभूति ।।
ये हैं शिक्षा की गुणवत्ता, मानवता कर्त्तव्य बोध की।
भ्रष्टाचर मिटे सता से. जो शीर्ष नेतृत्व को छूती ।।
मूल्य परक शिक्षा, शुचिता मानव में, और यथार्थता बचन कर्म की।
जन सरोकार की पूर्ति घर- घर, गूजे गणतंत्र भारत को ।।