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जब नफरत था, तो प्यार का सपना था, कविता; जब नफरत था, तो प्यार का सपना था। | MY XITIZ POETRY

जब नफरत था, तो प्यार का सपना था।

जब नफरत था, तो प्यार का सपना था।
जब नफरत था, तो प्यार का सपना था।
जब प्यार हुआ, तो नफरत एक जमाना हुआ।
जब नफरत करते थे, तो प्यार अच्छा लगता था।
आज प्यार है, फिर भी बात करने की जल्दी रहती है।
कभी नफरत में रहते थे, तो
ना देखना,ना बात करना ,अच्छा लगती थी।
आज प्यार है, फिर भी
देखनाऔर अकेले में बात करने की जल्दी रहती है।
स्कूल में जिसके साथ लड़ते थे,
दूर जसने पर उनको ही मोबाईल पर तलाशते है।
खुशी किसमे होती है,यह पता अब चला है।
नफरत क्या था इसका अहसास अब हुआ।
काश बदल सकते हम जिंदगी के कुछ साले।
काश जी सकते हम जिंदगी फिर एक बार।

Kshitij_pome, myxitiz.in
Kshitij Upadhyay KISHOR




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