किसान

बैलों को लेकर खेतों में , बढ़ता हुआ किसान देख लो ।
फसलों के बोझों से सुन्दर , भरा हुआ खलिहीन देख लो ।
ठठा सवेरे कृषक भोर में पशुओं को चारा खिलवाया ।
खेतों की क्यारी में उसने , जमकर पानी भी पटवाया ।
जोत रहा है कृषक खेत को , धूप उठकर ऊपर आया ।
घास जुटाकर दो पहरी में , उसने पशुओं को नहलाया । ।
खा पीकर रुखा – सूखा वह , लगता है दिन भर हैरान ।
लेकर अपने साथ किसी को , दौनी करने चला किसान । ।
 हुयी शाम तो चला हाट को , बेंचा सब्जी लाभ कमाया ।
घर के लिये खरीद चीज वह , आठ बजे सीधे घर आया । ।
उसके नन्हे बच्चे दौड़े , पापा बोलो क्या लाये हो ।
प्यारी मम्मी पूछ रही है , इतनी चीज कहाँ पाये हो । ।
बेटा ! मिहनत का फल मीठा , प्यार भरा जीवन है उसका ।
हमने मिहनत से सींचा है , सरस बनाया जीवन सबका । ।
हमी देश की नीव बने है । हमी देश की रीढ बने है ।
भर कर हम भंडार देश का , उन्नत आज किसान बने है ।
                         डॉ0 जी भक्त,
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