आसमान

   डॉ० जी० भक्त

छाता जैसा आसमान है ।
नीला सागर के समान है ।
चारो ओर दूर तक फैला ।
इसके नीचे जग महान है ।
सूरज धमका करता दिन में ,
रातो में तारो का झिलमिल ।
बदल की शोभा है न्यारी ,
चन्दा को आभा से हिलमिल । ।
उड़ती चिड़िया का समुह है ,
वायुयान को तेज सवारी ।
वायु के झोको से हिलती .
ऊंचे वृक्षो की हर डाली ।
वर्षा की बूंदो को देखो ,
बिजली की उजलो रेखाएँ ।
गरज – गरज कर आसमान में ,
शोर मचाती मेघ घटाएँ ।
देखो रॉकेट का धुआँ है ,
अंतरिक्ष को गंदा करता ।
अंधेरी रातों में जुगनू
रह – रह कर है चमका करता । ।
जाई के दिनो में कुहरा ,
सुबह शाम को छाया करता ।
सिंदुर की लाली फिर लेकर ,
सुबह शाम बिखराया करता । ।
इसी आसमान के नीचे ,
खेल जगत का होता आया ।
इस अनन्त मंडप में सबदिन ,
अखिल विश्व ने जीवन पाया । ।
बनो आसमान से ऊँचा ,
सागर सा गभिर बनो तुम ।
सुर्य चन्द्र सा जगमग सुन्दर ,
वायु सा बलवान बनो तुम । ।
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